Saturday, March 30, 2019

एक नज़्म

जब तलक तु रहा
दुनिया मुत्तासिर रही हमसे
हमें छूकर कसमें भी खाये गए
फिर जबसे तेरे साये गए
मत पूछ कितने ज़ुल्मों-सितम ढाये गए
क्या-ग़ुज़री जब बयाँ किया
तो झुटलाये गए
हम-दर्दी बस इतनी मिली
कि तक़लीफ़ मर्ज़-ए-फ़ितूर कहलाये गए।

ज़बाँ हमारी कान को तरसती थी
घटा उठती थी आँखों से बरसती थी
काई जमीं इन आँखों में
पर पोंछनें वाला कोई न था
ठिठुरते थे बारिश में हम
ओढ़ने को दुशाला कोई न था।

तेरे आमद की अब हम नज़्में गाते हैं
मन नहीं लोगों को बहलाते हैं
लौट आ
कि अब चमन में जगह तो नहीं
हम सड़कों पे ही खिल लेंगे
आ जा की नींद अब भी थोड़ी बाकी है
होश में न सही, हम ख़्वाबों में ही मिल लेंगे
आ जा ज़ख़्म हरा-भरा है अब तक
बग़ीचे न सही, फूल हमारे यहीं खिल लेंगे।
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                                                ताबिश



3 comments:

  1. I am touched. Love shall take us away.

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    2. Yes love is the only hope to find meaning in this world...

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